محمد اسماعيل | القصيدة.كوم

محمد اسماعيل

شاعرٌ مصريٌّ (1993-) قوافيه فراشات، كان أحسنَ حالًا وما زالَ أحسنَ حالًا، ولكنه شاعرٌ هذه هيَ لعنتُهُ الأبديّة.


72345 | 20 | 58 | إحصائيات الشاعر


حصاد الماء والتمر

3k | 5 | 5

نحن أبناءُ هذي الطبيعةِ

2.8k | 5 | 2

هو شاعر؟

2.4k | 5 | 0

أنفخ في رئة العزلة

2.4k | 5 | 5

من أحوال الريح

2.2k | 5 | 0

تجلِّي

2.2k | 5 | 2

ما يهذي به الطفل

1.7k | 5 | 1

خللٌ ما

1.7k | 5 | 2

وقتٌ مالحٌ لا يمرّ 

1.5k | 5 | 2

لأنّه

1.5k | 5 | 1

إليها

1.5k | 5 | 0

المشيُ في إيقاع الريح

1.4k | 5 | 0

بكاءات ورق الحائط (نوفمبر)

1.4k | 5 | 2

آمنوا بي كي أغني

1.4k | 5 | 0

يحارب نرسيسه في القصيدة

1.4k | 5 | 0

في مديح الخطأ

1.4k | 5 | 0

المجانين

1.3k | 5 | 0

ما لا أحبّ أن أقوله

1.3k | 5 | 0

يربّي على كفيه دهشته

1.3k | 5 | 2

أغنيات حجرية

1.3k | 5 | 1

الأنبياءُ الصغار

1.3k | 5 | 1

الرمل

1.3k | 5 | 0

فراشة/ قافية

1.3k | 5 | 0

صوتٌ من الماء

1.3k | 5 | 0

لا شعراء تسير على الماء

1.3k | 5 | 0

على حافة نهرِ الله، وظمأ الأسطورة

1.3k | 5 | 0

سَفَر

1.2k | 5 | 2

فم يابس الصوت

1.2k | 5 | 0

نشيد

1.2k | 5 | 0

تيه

1.2k | 5 | 1

ماذا يقولُ شاعرٌ في ٢٠١٩؟

1.2k | 5 | 0

لا تجرحوا الغيم

1.2k | 5 | 0

هيبة الأساطير

1.2k | 5 | 0

الإنسان يرقص

1.2k | 5 | 0

نار لفكرةٍ خضراء

1.2k | 5 | 1

سأفرّ من لغتي

1.1k | 5 | 1

من ذاكرة الرمل

1.1k | 5 | 0

شجرة

1.1k | 5 | 0

صوتي رئة للريح

1.1k | 5 | 0

خمس مرايا للانتحار

387 | 5 | 1

يسألونك عن الروح

6.6k | 3 | 2

ها قد بقيت وحدك

2.4k | 3 | 0

نبيّ يتهجّأ المعراج

406 | 0 | 0

ما وُجِد على جدارِ ميّتٍ

358 | 0 | 0

سراب لون الجسد

337 | 0 | 1

فيما يؤرّقني معنى بنفسجة

331 | 0 | 0

يرى في نفسه الأبد

322 | 0 | 1

ميعادٌ متأخر

322 | 0 | 0

هكذا كان يندهش

317 | 0 | 0

تقاسيم

314 | 0 | 0

صدأٌ في زُرقةِ البحر

291 | 0 | 0

نقش قديم على الماء

287 | 0 | 0

يقينٌ ضبّابيُّ الملامح

284 | 0 | 0

وردةٌ تذبحُ عطرها

283 | 0 | 0

أساطيرُ عاديّة

283 | 0 | 0

كيف يكتبُ قصيدتَهُ؟

282 | 0 | 0

خمس مرايا من الخوف

278 | 0 | 0

ظل النبوّة

276 | 0 | 0
محمد إسماعيل
30-11-1993

مقالات نقدية ذُكر فيها الشاعر: محمد اسماعيل


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ماذا فعل مظفّر النوّاب ليستحقَّ هذا الوداعَ المدوّي؟

القصيدة.كوم

عن عمر ناهز 88 عاماً، غادرَ الشّاعرُ العراقيُّ مظفّر النوّاب عالمنا، من غرفة بيضاء في مستشفى الجامعة في إمارة الشارقة، بعد رحلة طويلة بين السجون والمنافي والحانات والمنابر. في هذه المساحة، يحاول أربعة شعراء عرب من الجيل الجديد، أن يجيبوا - كلٌّ برؤيته وحساسيّته - عن سؤال بسيط وصعب: ماذا فعل مظفّر النوّاب؟


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