سعدي يوسف | القصيدة.كوم

سعدي يوسف

Saadi Yousif

شاعر ومترجم وصحفي وناشط سياسي عراقي، وهو ركن أساسي من أركان الشعر العربي الحديث، حاصل على جائزة الأركانة العالمية عام 2009 (1934-2021)


58089 | 20 | 257 | إحصائيات الشاعر


خطوات الصحو

958 | 5 | 0

أقترحُ نَخْباً!

460 | 5 | 3

حفيدُ امريءِ القيسِ

2.4k | 0 | 3

قلعةُ الحِصْنِ التي قُربَ حِمْص

1.6k | 0 | 0

عبورُ الوادي الكبير

1.5k | 0 | 0

تهليلة

1.3k | 0 | 1

الشيوعيّ الأخير

984 | 0 | 1

مجاز وسبعة أبواب

835 | 0 | 1

اشتياقٌ

775 | 0 | 2

لا قهوةَ في الصباح

655 | 0 | 0

الخيط

654 | 0 | 0

حكمة متأخرة جداً

612 | 0 | 2

إصغاء الأصم

519 | 0 | 0

أزهارٌ بُوقيّةٌ

463 | 0 | 0

حكاية

450 | 0 | 0

الشيوعيّ الأخير يدخل الجنّة

448 | 0 | 1

الحُريّة

434 | 0 | 0

سعادةٌ!

428 | 0 | 1

ولماذا لا أكتبُ عن كارل ماركس؟

424 | 0 | 0

ثلاث سونيتات إلى هيروشيما العراق

420 | 0 | 0

في تلك الأيام

416 | 0 | 0

الشيوعيّ الأخير يذهبُ إلى البصرة

411 | 0 | 0

الأحفاد

406 | 0 | 2

كلامٌ في غير وقتهِ

395 | 0 | 0

نبتة الورد الإيرلنديّ

386 | 0 | 0

معروف الرّصافـيّ

383 | 0 | 0

هدية صباحية

374 | 0 | 0

جَبْلة

371 | 0 | 0

المقتلة

370 | 0 | 0

تداخل

346 | 0 | 0

رسالةٌ أخيرةٌ من الأخضر بن يوسف

344 | 0 | 0

يا نبعةَ الرّيحان

325 | 0 | 0

دَوْخةُ الطيَران

311 | 0 | 0

قارةُ الآلِهة

310 | 0 | 0

بطاقةٌ إلى ممدوح عدوان

300 | 0 | 0

طُهْرٌ

300 | 0 | 0

إلى سركون بولص

293 | 0 | 0

الفنادق

293 | 0 | 0

تمْرةٌ

292 | 0 | 0

نومُ الهناءةِ

279 | 0 | 0

فندق رِتْز

278 | 0 | 0

للعقيدِ مَن يُكاتبُهُ

278 | 0 | 0

شعابٌ جبلية

272 | 0 | 0

بيانو كونداليزا رايس

269 | 0 | 0

اللعِبُ مع السّونَيت

266 | 0 | 0

لستُ أدري ما سأقول ...

263 | 0 | 0

استِجابةٌ طُهْرٌ

263 | 0 | 0

يوتوبيا

254 | 0 | 0

حقيقةٌ

253 | 0 | 0

خمرةٌ سوداءُ

252 | 0 | 0

القصيدة قد تأتي

248 | 0 | 0

صلاةُ الوثـنِيّ

245 | 0 | 0

مقهى الحافة

244 | 0 | 0

الشيوعي الأخير يقرأ أشعاراً في كندا

243 | 0 | 0

لِتَكُنْ شوكةً !

239 | 0 | 0

عوامة النيل

238 | 0 | 0

النقيض

238 | 0 | 0

الصِّلُّ

237 | 0 | 0

الأصفرُ بيتي EN

236 | 0 | 0

قصيدة في يوم السبت اكتملتْ في يوم الأحد

232 | 0 | 0

نصيحةُ أبو إياد

232 | 0 | 0

وَشْمُ الذئبِ

230 | 0 | 1

الفلاسفة

228 | 0 | 0

حضرموت

226 | 0 | 0

العالية

224 | 0 | 0

في الحديقة العامة

222 | 0 | 0

أبو نُواس 1

221 | 0 | 0

تعشيقٌ

221 | 0 | 0

أبْلَهُ الحَيّ

219 | 0 | 0

نافذة

217 | 0 | 0

هل نتعلّمُ؟

216 | 0 | 0

طائرُ الزِّرْياب

216 | 0 | 0

عدَن 1986 … إلخ

216 | 0 | 0

طنجة

215 | 0 | 0

تِلِمْسان

214 | 0 | 0

بيتُ جَدِّي

214 | 0 | 1

رفض

214 | 0 | 0

خبزي خبزُ الفقيرِ

213 | 0 | 0

بعد حين

212 | 0 | 0

الأزِقّةُ

211 | 0 | 0

البحيرة المتجمِّدة

211 | 0 | 0

سونيت على الخفيف

208 | 0 | 0

سونيت دجلة

206 | 0 | 0

الخلاص

206 | 0 | 1

تلك الظهيرة البرلينيّة EN

206 | 0 | 0

إذاً … خُذْها عندَ البحرِ

205 | 0 | 0

مطرٌ خفيفٌ

204 | 0 | 0

محجوب العَيّاري

202 | 0 | 0

الإصغاءُ

202 | 0 | 0

دُعابةٌ

201 | 0 | 0

بُحيرةُ أونتارْيو

201 | 0 | 0

لَينين في زيوريخ 3

201 | 0 | 0

يومُ جُمعةٍ رَطبٌ

201 | 0 | 0

السماءُ والطّارق بنُ زياد

200 | 0 | 0

القطط

200 | 0 | 0

ستراني في لندن

199 | 0 | 0

مائدةٌ للطيرِ والسنجاب

199 | 0 | 0

الطبيعةُ تلعبُ بي …

199 | 0 | 0

تنويعٌ على سؤالِ رئيسِ أساقفةِ كانتربَري

196 | 0 | 0

كنتُ أتمشّى ظُهراً

195 | 0 | 0

ذلك النهار الممطر EN

195 | 0 | 0

مشروعٌ

194 | 0 | 0

باب سُلَيمان

194 | 0 | 0

لي بيتٌ لطيفٌ

192 | 0 | 0

تسيرُ أندريا إلى السيّارة البيضاء

191 | 0 | 0

العاشقتانِ تحت المظلّة

190 | 0 | 0

سونيت على الطويل

190 | 0 | 0

في شتاء القرية

190 | 0 | 0

عند القناة

190 | 0 | 0

في صباحٍ غائمٍ

190 | 0 | 0

وشم القرنفل

188 | 0 | 0

من ساحة الجمهورية إلى الطُرُق الأربعة

188 | 0 | 0

مقهى بورت

187 | 0 | 0

طريقٌ مسدودٌ ؟

187 | 0 | 0

طائرُ التَدْرُج

186 | 0 | 0

ضوءٌ في الغابة

186 | 0 | 0

مزرعة الكُروم

186 | 0 | 0

نصيحةُ مُجَرِّبٍ

186 | 0 | 0

الشمسُ التي لا تأتي

185 | 0 | 0

بوذا التِّبت

185 | 0 | 0

سأكتب مثل عازف البيانو

184 | 0 | 0

أنا وأندريا و السطحُ

184 | 0 | 0

مَهْووسٌ

184 | 0 | 0

صباح الأحد في طنجة

183 | 0 | 0

الخريف الإنجليزيّ

183 | 0 | 0

باب اللوق

183 | 0 | 0

سِيْدِي بِلْعبّاس

182 | 0 | 0

مرّاكش يا أندريا !

182 | 0 | 0

عبد السلام

182 | 0 | 0

"جَنْبيّةُ" القُضاة

181 | 0 | 0

خاطرةٌ عن المِرآة

181 | 0 | 0

لا تحاوِلْ في مَشرَب التاج

179 | 0 | 0

هذا الأوّل من أيّار

179 | 0 | 0

إحتِكام

178 | 0 | 0

الحَيّ الصينيّ في تورنتو

177 | 0 | 0

وادي الجِنّ

177 | 0 | 0

أغنيةُ البحار الثلاثة

176 | 0 | 0

الأنينُ

176 | 0 | 0

فُرات

175 | 0 | 0

بعد قراءة روايةٍ عن القرن التاسع عشر

174 | 0 | 0

صراحة

173 | 0 | 1

كيسُ الخَيشِ

173 | 0 | 0

رايةُ كارل ماركس

173 | 0 | 0

محطّةُ الشّمال

173 | 0 | 0

رمسيس الثاني

172 | 0 | 0

حالةٌ مستعصيةٌ

172 | 0 | 0

حُسين داي 1964

172 | 0 | 0

كاثدرائيّةُ مَغْنِيّة (بالغرب الجزائري)

170 | 0 | 0

ربيع تورنتو

169 | 0 | 0

حانةُ البِرْغُولا

168 | 0 | 0

الحديقة العامّة

168 | 0 | 0

ابنُ عائلةٍ ليبيٌّ مقيمٌ في روما

168 | 0 | 0

لَينينْ في زيوريخ 1

167 | 0 | 0

زفافٌ ملَكيّ

166 | 0 | 0

هَلْوَسةٌ خَفيفةٌ

166 | 0 | 0

في تَدْمُر

165 | 0 | 0

تجربةٌ ناقصةٌ

164 | 0 | 0

دَيرٌ على الدانوب

163 | 0 | 0

سِياجٌ في الريف

163 | 0 | 0

سونيت على المتقارَب

162 | 0 | 0

حسين قهوجي

162 | 0 | 0

لَينين في زيوريخ 2

162 | 0 | 0

أطاعَ غناءَ الحوريّاتِ

162 | 0 | 0

مَرْتِيْل

161 | 0 | 0

تغييرُ عاداتٍ

161 | 0 | 0

لَيليّةٌ

161 | 0 | 0

شاطئ رامبو

160 | 0 | 0

إيْسْتْبُوْرْنْ في الشتاء

160 | 0 | 0

قصيدةُ مَديحٍ

160 | 0 | 0

الأخضر بن يوسف ومشاغله

160 | 0 | 0

صباحٌ باريسيٌّ خفيفٌ

159 | 0 | 0

في مُحْتَرَفِ نُعمان هادي بالضاحية الباريسية

159 | 0 | 0

تأمُّلٌ

159 | 0 | 0

نابوليون في برلين

159 | 0 | 0

بَدْلةُ العاملِ الزرقاءُ

158 | 0 | 0

المغربيّ يقول ...

158 | 0 | 0

سونَيتْ إلى أبي العلاء

158 | 0 | 0

البريدُ الليليّ

158 | 0 | 0

هادي العَلَويّ

157 | 0 | 0

كلامٌ فارغٌ

157 | 0 | 0

أبو نُواس 2

156 | 0 | 0

نظرةٌ جانبيّةٌ

155 | 0 | 0

سانْتْ آيفيس

155 | 0 | 0

غيرَ بعيدٍ عن البحر

153 | 0 | 0

بين ليلى ودجلة

153 | 0 | 0

تنويعٌ ثالثٌ

153 | 0 | 0

بعدَ أن انتصفَ الليلُ

152 | 0 | 0

فَخّارٌ

152 | 0 | 0

الطّاهر وطّار

152 | 0 | 0

المجَنَّح

152 | 0 | 0

الماندولين

152 | 0 | 0

القصيدة العاشرة

151 | 0 | 0

منخفَضٌ جوّيٌّ

151 | 0 | 0

صباحٌ أليفٌ

149 | 0 | 0

نادِين غوردِمَر

149 | 0 | 0

أندريا في ماء الفرات

149 | 0 | 0

أبو نُواس 3

148 | 0 | 0

رجاءٌ

148 | 0 | 0

حانة أزْمِرالْدا

147 | 0 | 0

ذِكرياتٌ من هناك

147 | 0 | 0

إلى دوستَينا لافَرْن

146 | 0 | 0

صباح عيد الفِصْح

146 | 0 | 0

حانةُ البريد

145 | 0 | 0

السونَيت الخمسون

145 | 0 | 1

بُولِيرو تُغَنِّيها امرأةٌ

144 | 0 | 0

سونيت تورنتو

143 | 0 | 0

الأصواتُ تأتي من عروق الذهب

143 | 0 | 0

كونشيرتو للبيانو والكْلارِيْنَتْ

143 | 0 | 0

أُقَلِّدُ العُذْريّين !

142 | 0 | 0

أيُّ كَرَمٍ !

141 | 0 | 0

الحصانُ والجَنِيْبَةُ

141 | 0 | 0

أيُّهذا الحنينُ ، يا عدوِّي EN

140 | 0 | 0

ترتدي مَلْحَفاً

138 | 0 | 0

بعدَ قصفِ طرابلُس

136 | 0 | 0

سوقُ السبت في بولزانو

98 | 0 | 0

عيشة بنت الباشا

97 | 0 | 0

الحِزامُ العريضُ

94 | 0 | 0

الفِصْحُ في كاثدرائية سالِزْبَري

69 | 0 | 0

احتِرافٌ

68 | 0 | 0

سـيّدةُ النهـر

68 | 0 | 0

مثلّثٌ مقلوبٌ

66 | 0 | 0

مدخلٌ سرّيّ إلى قلعة فورتيسّا

66 | 0 | 0

الدّرسُ الأوّل

65 | 0 | 0

عُرسُ بناتِ آوى

63 | 0 | 0

ليسَ مِن تَلاعُبٍ

62 | 0 | 0

ليلُ البحيرةِ المتجلِّدة

61 | 0 | 0

الوقتُ مُحْكَماً

60 | 0 | 0

أيامُ العملِ السّـرّيّ

59 | 0 | 0

سماءٌ مُوازيةٌ

58 | 0 | 0

دَنَفٌ

57 | 0 | 0

مقامٌ عراقيٌّ معَ أغنية وبَسْتة

56 | 0 | 0

اللغة الأولى

56 | 0 | 0

قصيدةٌ يائسةٌ

55 | 0 | 0

متفائلاً أحيا

54 | 0 | 0

تميمةٌ

54 | 0 | 0

مخطوط

53 | 0 | 0

نهارُ أحدٍ ملتبسٌ

53 | 0 | 0

النظرة

52 | 0 | 0

الثوبُ المرمرُ

52 | 0 | 0

أسرارٌ بسيطةٌ

52 | 0 | 0

الحيُّ الهنديُّ بلندن

52 | 0 | 0

مُقامُ المَرء

51 | 0 | 0

قلعةُ السماءِ البيضاءِ

51 | 0 | 0

أربعة مقاطع عن المكان

51 | 0 | 0

مَنْزَهُ الأنهارِ الثلاثةِ

48 | 0 | 0

نحتفي بالرماد

48 | 0 | 0

ثلاثيّةٌ أيضاً ...

48 | 0 | 0

حالةُ البحّار

48 | 0 | 0

طبيعةٌ

47 | 0 | 0

علاقةٌ مُراوِغةٌ

47 | 0 | 0

مطعمٌ شِبْهُ أميركيّ

47 | 0 | 0

سأنتظِرُ !

47 | 0 | 0

مصطفى المصريّ

46 | 0 | 0

المُهْرُ في القُرْنةِ ( البرّ الغربيّ )

46 | 0 | 0

المَوعِد

46 | 0 | 0

ثلاثةُ مَقاطعَ مدوّرةٌ على الوافِر

45 | 0 | 0

"نابل" في الشتاء

43 | 0 | 0

مقالات نقدية ذُكر فيها الشاعر: سعدي يوسف


161

حداثة القصيدة العربية وتقنية القناع - نقل أم توظيف؟

يمنى العيد

تشكِّل الحداثةُ مهاداً نظريّاً وإطاراً تاريخيّاً لـ "قصيدة القناع" كما عَرفَها الشعرُ العربيُّ الحديث. ويمكن القولُ، بدايةً، بأنّ الحداثة فعلُ تجاوزٍ مستمرّ يفضي إلى نهوض الأدب أو الفنّ في بنيةٍ مفتوحة، وذلك على قاعدةِ علاقةِ ما هو فنٌّ أو أدبٌ بالإنسان في معناه المتجذِّر في الزمن والنافذِ إلى جوهر الحياة. على أنّ القول بأنّ الحداثة فعلُ تجاوزٍ ليس منعزلاً عن منظورٍ فكري تَحَكّم برؤية الحداثيين العرب إلى الإنسان في واقعه وتاريخه، وفي أشكال صراعه ضدّ الموت، ومن أجل حياةٍ لا يزال يَحْلم بها. وعليه، ينطوي فعلُ التجاوز على هدمٍ وبناء: إنّه هدمٌ لتقاليدِ بنيةِ الشكل المنغلقة على مضامينها؛ وبناءٌ لشكلٍ فنيّ قابلٍ باستمرارٍ للتجدُّد تعبيراً عن حلم الإنسان ومسعاه إلى تحقيقه. ولا يستهدف الشكلُ المتجدِّدُ الوصولَ إلى بنيةٍ محدَّدة، أو إلى ما يعيد البنيةَ إلى ثوابتَ تُعرَّف بها؛ ذلك لأنّ مثلَ هذا الاستهداف يعني استهدافَ الوصولِ إلى ما يَكْتمل ويَقْبل انغلاقَه على اكتماله؛ وهو ممّا يَحْمل على الركون، ويشي بنهايةٍ أو ركودٍ للفاعليّة ولحركةِ تخلّقها. وفي حين يستدعي المكتمِلُ فكرةَ النموذج المنجَز، الذي يفترض التقليدَ، تستهدف الحداثةُ هدمَ النموذج بمعناه هذا، فتفكِّك لغتَه لارتباطها بتكريس قيمه وثباتِ صورها في الوعي الجمعي.



71

سعدي يوسف الواقف على الأطلال

حسان الجودي

هو ذا شاعرٌ لا يشبه شاعراً عربياً آخر، كما كتب محمود درويش. شاعرٌ مقلُّ الكلام نحيلٌ، مثل قصيدته النحيلة الخالية من الحذلقات اللغوية والصور المدهشة. لغةٌ متقشّفةٌ زاهدةٌ، لكنها تختزل الكثير من المعاني. يقول صاحبها عنها، إنها خاليةٌ من الكولسترول، ويقول عنها، إنها لغةٌ متجذرةٌ في المكان. ونقول عنها، إنها لغةٌ محتشدةٌ بالصور الفوتوغرافية للكون من كلِّ الزوايا الممكنة. ويقول عنها، إنها تقف باحترام أمام نصوص الشّعراء الجاهليين. ونقول عنه، إنه الشّاعر العربي الوحيد، الذي أسّس لعلاقة فريدة مختلفة مع المكان. ونقول عنه إنَّ قصائده هي وقوف طللي جديدٌ مختلف. لكنه ظلَّ أحياناً أسير المدارات الطللية القديمة، ولم يستطع الخروج منها.


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