في الكهف - الطيب طهوري | القصيدة.كوم

شاعرٌ جزائريٌّ (1956-) يقول: مُدني بعصاك البعيدةِ، سحرِكَ.. كي ما أمد يدي في الظلال.. مدني بعميق السؤال.


141 | 0 | 0 | 0



أنتِ هنا كهفي..
ويداي ظلامك..
ادخل..
أمشي..أمشي..أمشي..
حين يكون خروجي منك وشيكا تشتعلين..
كثيرا تشتعلين..
ونارك تأتيني من كل جهاتك..
أخرج..لهثا أخرج..
جسدي عرق يتصبب..
وخطاي سراب يجري خلف سراب..
لكن رياحك عاتية..
تحملني في اللحظة..
تذروني في كل مكان ..
وعلى الأشجار..
على الأحجار..
رمادا أسقط..
***
صوتك يعبرني..
قدماك..
وتبتعدين كثيرا..
يبقى في الصهد غبارك..
***
تنهض ريحي..
وأكون أمامك كهفا ليس له باب خروج..
أتقدم نحوك..
أفتحني لخطاك..
تسيرين..تسيرين..تسيرين..
وأغلقني فيك عليّ/عليك..
***
أنت تصيرين أنا..
وأنا مثلك أنظرني..
وأراني أنتِ..
هنا..في هذا الكهف الحجري..
نموت ونحيا..
نحيا و نموتُ..
وخمرا نشربنا..
دودا ننشرنا في كل مكان..
***
دودي في بطن العصفورة صارَ.
ودودك في بطن العصفور..
***
بزغت شمس اليوم التالي..
صرنا في جوف الثعبان..
***
طلعت شمس أخرى..
كنا في مقلاة الإنسان..


الآراء (0)   

دعمك البسيط يساعدنا على:

- إبقاء الموقع حيّاً
- إبقاء الموقع نظيفاً بلا إعلانات

يمكنك دعمنا بشراء كاسة قهوة لنا من هنا: