بطريقة أو بأخرى - فرناندو بيسوا | اﻟﻘﺼﻴﺪﺓ.ﻛﻮﻡ

شاعر برتغالي، أهم شعراء البرتغال على الإطلاق، كان يستخدم أسماء مستعارة عند نشر قصائده وصلت إلى 70 اسم مستعار (1888-1935)


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(من قصائد ألبرتو كاييرو )

بطريقة أو بأخرى،
وفقاً للصواب أو لا،
وقدرتي على قول ما أفكّر فيه،
وقوله أحياناً برداءة أو بطريقة مغلوطة،
فأنا أكتب أشعاري بدون تعمّد،
كما لو ان عمل الكتابة ليس من صُنع إشارات،
كما لو أن فعل الكتابة يحدث لي
كمن يأخذ حمّام شمس.

أسعى الى قول ما أعاني
من دون أن أفكّر في ما أعاني.
أسعى الى تطبيق الكلمات على الفكرة،
وألاّ أحتاج الى مجاز الفكر
ليفضي بي الكلام.

لا أتوصّل دائماً الى معاناة ما أعرف
أنّ عليّ معاناته.
لا يجتاز تفكيري النهر سباحةً
إلاّ في بطءٍ شديد،
لأن اللباس الذي فرضه عليه الناس يثقل عليه.
أحاول أن أتجرّد مما تعلّمت،
أعمل على نسيان نمط التفكير الذي أرسخوه في ذهني،
على مَحْو الحِبر الذي لطّخوا به حواسي،
على إطلاق مشاعري الحقيقية،
على نزع ما يغلّفني، وأن أكون ذاتي – وليس ألبرتو كاييرو،
ولكن حيواناً بشرياً من صُنع الطبيعة.

وها أنذا أكتب الآن، وبي توقُ الى
الاحساس بالطبيعة، لا كإنسان حتى،
بل كمن يحسّ بالطبيعة لا غير.
وهكذا أكتب، فأجيد حيناً وأخفق حيناً،
وحيناً أُدرك بسهولة ما أريد التعبير عنه، وحيناً أضلّ،
فأسقط هنا، وأنهض هناك،
ولكنّي أتابع دائماً طريقي كأعمى عنيد.
ما هَمّ… فبرغم كل شيء أنا فردٌ من الناس.
أنا مكتشف الطبيعة.
أنا مغامر الاحاسيس الحقيقية.
أحمل الى العالم عالماً جديداً،
لأني أحمل الى العالم العالمَ بالذات.

هذا ما أحسّه وما أكتبه،
عارفاً تماماً وبدون إلقاء نظرةٍ حتى،
أن الساعة هي الخامسة صباحاً،
وأن الشمس وإن لم تُطلّ بعد برأسها
من فوق جدار الأفق،
فإننا نتبيّن أطراف أصابعها
وهي تمسك بأعلى جدار الأفق
المليء بالجبال المنخفضة.






(ﺟﻤﻴﻊ ﺗﺮﺟﻤﺎﺕ هنري فريد صعب)
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